संसद में घटती बहस की गुणवत्ता भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। संसद वह मंच है, जहाँ राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर तर्क, संवाद और नीति-निर्माण होता है। लेकिन हाल के वर्षों में संसदीय बहसों का स्तर लगातार सवालों के घेरे में रहा है।
संसदीय बहस का महत्व
संसद में होने वाली बहसें लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती हैं। यहीं सरकार की नीतियों की जाँच-पड़ताल होती है, विपक्ष सवाल उठाता है और जनता के मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनते हैं। गुणवत्तापूर्ण बहस बेहतर कानून और जवाबदेह शासन की नींव रखती है।
बहस की गुणवत्ता में गिरावट के कारण
हाल के समय में संसद की कार्यवाही बार-बार व्यवधानों, नारेबाजी और राजनीतिक टकरावों से प्रभावित होती रही है। कई बार गंभीर विषयों पर विस्तृत चर्चा के बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाते हैं।
इसके अलावा, समय की कमी, संसद सत्रों की घटती अवधि और मीडिया-केन्द्रित राजनीति भी बहस की गहराई को कमज़ोर करती है।
लोकतंत्र पर प्रभाव
जब संसद में गुणवत्तापूर्ण बहस नहीं होती, तो कानूनों पर पर्याप्त विचार नहीं हो पाता। इससे नीतियों की प्रभावशीलता घटती है और जनता का संसदीय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र में संवाद की जगह टकराव ले लेता है।
समाधान और सुधार के उपाय
संसद में बहस की गुणवत्ता सुधारने के लिए सभी दलों को संसदीय मर्यादाओं का सम्मान करना होगा। विषय-आधारित चर्चा, विशेषज्ञ समितियों की भूमिका, सदस्यों की तैयारी और विपक्ष को पर्याप्त समय देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
निष्कर्ष
संसद में घटती बहस की गुणवत्ता केवल एक संस्थागत समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि संसद संवाद और तर्क का मंच बनी रहे, तो ही भारतीय लोकतंत्र मजबूत और प्रभावी रह सकता है। इसके लिए जिम्मेदार राजनीति और सजग जनप्रतिनिधि अत्यंत आवश्यक हैं।
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