न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद विषय है। जब न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करते हुए कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है, तो इसे न्यायिक सक्रियता कहा जाता है। ऐसे में यह सवाल उठता है — क्या यह लोकतंत्र की ज़रूरत है या फिर शक्तियों का अतिक्रमण?
न्यायिक सक्रियता क्या है?
न्यायिक सक्रियता का अर्थ है जब अदालतें केवल कानून की व्याख्या तक सीमित न रहकर नीतिगत दिशा-निर्देश देती हैं, मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतः संज्ञान लेती हैं और जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से सामाजिक मुद्दों में हस्तक्षेप करती हैं।
न्यायिक सक्रियता की ज़रूरत क्यों?
जब कार्यपालिका निष्क्रिय हो या विधायिका जनहित के मुद्दों पर प्रभावी कानून न बना पाए, तब न्यायिक सक्रियता नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का माध्यम बनती है। पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मामलों में न्यायपालिका की भूमिका कई बार निर्णायक रही है।
अतिक्रमण के आरोप क्यों?
न्यायिक सक्रियता की आलोचना यह कहकर की जाती है कि इससे शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत कमजोर होता है। जब अदालतें नीति निर्माण या प्रशासनिक निर्णयों में सीधे हस्तक्षेप करती हैं, तो यह कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में दखल माना जाता है। इससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई जाती है।
लोकतंत्र पर प्रभाव
न्यायिक सक्रियता ने एक ओर लोकतंत्र को अधिकार-संवेदनशील बनाया है, तो दूसरी ओर संस्थागत टकराव को भी जन्म दिया है। इसलिए न्यायपालिका की भूमिका न तो पूरी तरह निष्क्रिय होनी चाहिए और न ही नीति-निर्माता की तरह।
संतुलन की आवश्यकता
लोकतंत्र की मजबूती के लिए न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम (Judicial Restraint) के बीच संतुलन आवश्यक है। न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक बनकर मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन अन्य संस्थाओं की भूमिका का सम्मान भी बनाए रखना चाहिए।
निष्कर्ष
न्यायिक सक्रियता: ज़रूरत या अतिक्रमण? इसका उत्तर परिस्थिति और संदर्भ पर निर्भर करता है। जहाँ यह नागरिक अधिकारों की रक्षा का सशक्त माध्यम है, वहीं अत्यधिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक संतुलन को कमज़ोर कर सकता है। मजबूत लोकतंत्र के लिए न्यायपालिका की सक्रियता संविधान की सीमाओं में रहकर ही सबसे प्रभावी साबित होती है।
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