राजनीति में परिवारवाद भारतीय लोकतंत्र में एक लंबे समय से चर्चा और विवाद का विषय रहा है। परिवारवाद का अर्थ है राजनीति में सत्ता, पद और टिकट का एक ही परिवार या वंश में सिमट जाना। यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या परिवारवाद लोकतंत्र की मजबूती है या फिर एक गंभीर समस्या?
राजनीति में परिवारवाद क्या है?
जब किसी राजनीतिक दल या सार्वजनिक पद पर योग्यता और जनसमर्थन की बजाय पारिवारिक संबंधों के आधार पर नेतृत्व आगे बढ़ता है, तो उसे परिवारवाद कहा जाता है। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर देखी जाती है।
परिवारवाद के पक्ष में तर्क
परिवारवाद के समर्थक मानते हैं कि राजनीतिक परिवारों में नेतृत्व का अनुभव, राजनीतिक समझ और जनसंपर्क पहले से मौजूद होता है। इससे नए नेताओं को राजनीति की जटिलताओं को समझने में सहूलियत मिलती है। कुछ मामलों में, ऐसे नेता जनता का विश्वास भी बनाए रखते हैं।
परिवारवाद क्यों बनता है समस्या?
परिवारवाद का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह योग्य और मेहनती लोगों के लिए राजनीति के दरवाज़े सीमित कर देता है। जब पद और अवसर वंशानुगत हो जाते हैं, तो लोकतंत्र में बराबरी और प्रतिस्पर्धा कमज़ोर पड़ जाती है। इससे आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही भी प्रभावित होती है।
लोकतंत्र पर प्रभाव
परिवारवाद लोकतंत्र की मूल भावना — समान अवसर — के खिलाफ जाता है। यह राजनीति को कुछ चुनिंदा परिवारों तक सीमित कर देता है, जिससे जनता का राजनीतिक व्यवस्था पर विश्वास कमजोर हो सकता है। लंबे समय में, यह राजनीतिक संस्थाओं को कमज़ोर करता है।
समाधान और आगे का रास्ता
परिवारवाद की समस्या से निपटने के लिए राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शी चयन प्रक्रिया और योग्यता आधारित नेतृत्व को बढ़ावा देना जरूरी है। साथ ही, जागरूक मतदाता ही तय कर सकते हैं कि वे वंश नहीं, बल्कि काम और क्षमता के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुनें।
निष्कर्ष
राजनीति में परिवारवाद न तो पूरी तरह सही कहा जा सकता है और न ही पूरी तरह अनदेखा किया जा सकता है। लेकिन जब यह योग्यता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हावी हो जाए, तो यह एक गंभीर समस्या बन जाता है। मजबूत लोकतंत्र के लिए राजनीति में अवसर, पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य हैं।
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