संविधान संशोधन की प्रक्रिया भारत के संविधान को समय और परिस्थितियों के अनुसार लचीला बनाने के लिए अपनाई गई एक संवैधानिक व्यवस्था है। इसके माध्यम से संविधान में आवश्यक परिवर्तन किए जाते हैं, ताकि लोकतंत्र, शासन और नागरिक अधिकारों को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
संविधान संशोधन का अर्थ
संविधान संशोधन का अर्थ है संविधान के किसी अनुच्छेद, अनुसूची या प्रावधान में परिवर्तन, जोड़ या हटाना। भारत का संविधान न तो पूरी तरह कठोर है और न ही पूरी तरह लचीला, बल्कि यह आंशिक रूप से लचीला और कठोर है।
संविधान संशोधन की तीन प्रमुख प्रक्रियाएँ
1️⃣ साधारण बहुमत द्वारा संशोधन
कुछ प्रावधानों में संसद के साधारण बहुमत से संशोधन किया जा सकता है। इसमें लोकसभा और राज्यसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत पर्याप्त होता है।
2️⃣ विशेष बहुमत द्वारा संशोधन
अधिकांश संवैधानिक संशोधन इस प्रक्रिया से Fletcher होते हैं। इसमें आवश्यक है —
- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत
- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत
3️⃣ विशेष बहुमत + राज्यों की सहमति
संघीय ढांचे से जुड़े विषयों में संशोधन के लिए —
- संसद का विशेष बहुमत
- कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति
इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य होती है।
राष्ट्रपति की भूमिका
संविधान संशोधन विधेयक जब संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति इसमें सहमति देने के लिए बाध्य होते हैं, और पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते।
मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की मूल संरचना को बदला नहीं जा सकता। जैसे — लोकतंत्र, संघीय ढांचा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता।
निष्कर्ष
संविधान संशोधन की प्रक्रिया भारत को एक जीवंत और व्यावहारिक संविधान प्रदान करती है। यह प्रक्रिया परिवर्तन और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखती है, जिससे संविधान समय के साथ प्रासंगिक बना रहता है।
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