केन्द्र एवं राज्य सरकार के बीच टकराव भारतीय संघीय व्यवस्था (Federal System) की एक महत्वपूर्ण लेकिन संवेदनशील वास्तविकता है। संविधान में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होने के बावजूद, अक्सर केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकार, संसाधन और नीतियों को लेकर मतभेद सामने आते हैं।
केन्द्र–राज्य टकराव के प्रमुख कारण
1️⃣ अधिकारों का बँटवारा:
संविधान की सातवीं अनुसूची में
केंद्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची का प्रावधान है।
समवर्ती सूची के विषयों पर
कानून बनाने को लेकर
अक्सर टकराव की स्थिति बन जाती है।
2️⃣ वित्तीय संसाधनों को लेकर विवाद:
कर संग्रह और संसाधनों का बड़ा हिस्सा
केन्द्र के पास रहता है,
जबकि राज्यों को
अपनी योजनाओं के लिए
केंद्रीय अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।
यह वित्तीय असंतुलन
तनाव का बड़ा कारण बनता है।
3️⃣ राज्यपाल की भूमिका:
राज्यपाल की नियुक्ति केन्द्र द्वारा होने के कारण
कई बार उन पर
केंद्र के पक्ष में काम करने के आरोप लगते हैं,
जिससे राज्य सरकार और केन्द्र के बीच
विश्वास की कमी पैदा होती है।
4️⃣ राजनीतिक मतभेद:
जब केन्द्र और राज्य में
अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकार होती है,
तो नीतिगत फैसलों,
योजनाओं और प्रशासनिक मामलों में
टकराव की संभावना बढ़ जाती है।
5️⃣ केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका:
CBI, ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई को
कई राज्य
संघीय ढांचे में हस्तक्षेप मानते हैं,
जिससे टकराव और गहराता है।
केन्द्र–राज्य टकराव के उपाय
1️⃣ सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism):
केन्द्र और राज्यों को
प्रतिस्पर्धा के बजाय
सहयोग की भावना से काम करना चाहिए,
ताकि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों में संतुलन बना रहे।
2️⃣ संवाद और समन्वय:
Inter-State Council, NITI Aayog जैसे मंचों के माध्यम से
नियमित संवाद और परामर्श
टकराव को कम कर सकता है।
3️⃣ वित्तीय न्याय:
राज्यों को
पर्याप्त वित्तीय स्वायत्तता और
समय पर अनुदान देकर
आर्थिक असंतुलन को कम किया जा सकता है।
4️⃣ राज्यपाल की निष्पक्ष भूमिका:
राज्यपाल को
संवैधानिक मर्यादाओं में रहकर
निष्पक्ष और तटस्थ भूमिका निभानी चाहिए,
ताकि राजनीतिक विवाद न बढ़ें।
5️⃣ न्यायपालिका की भूमिका:
संघीय विवादों के समाधान में
सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्ष व्याख्या
संवैधानिक संतुलन बनाए रखने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
निष्कर्ष
केन्द्र एवं राज्य सरकार के बीच टकराव पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे संवैधानिक मर्यादाओं, संवाद और सहयोग के माध्यम से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। मजबूत सहकारी संघवाद ही भारत की एकता, विकास और लोकतांत्रिक स्थिरता की कुंजी है।
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