January 2, 2026
नई दिल्ली: धार्मिक स्वतंत्रता भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में से एक है, जो प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता प्रदान करती है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि राज्य किसी भी धर्म को न तो बढ़ावा दे और न ही किसी के साथ भेदभाव करे।
भारतीय समाज की विविधता को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने धर्म से जुड़े अधिकारों को लोकतंत्र की बुनियादी शर्त माना। इसी कारण भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित किया गया।
संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित हैं। इन अनुच्छेदों के अंतर्गत नागरिकों को धर्म को मानने, अपनाने, प्रचार करने और धार्मिक संस्थाओं का संचालन करने का अधिकार प्राप्त है।
- अनुच्छेद 25: धर्म की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 26: धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन
- अनुच्छेद 27: धार्मिक कर से संरक्षण
- अनुच्छेद 28: शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा
सीमाएँ और सामाजिक संतुलन
धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण और निरंकुश नहीं है। संविधान यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक आचरण सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। राज्य को यह अधिकार है कि वह सामाजिक सुधार और सार्वजनिक हित में उचित प्रतिबंध लगा सके।
“धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ अन्य नागरिकों के अधिकारों का हनन नहीं हो सकता।” — संवैधानिक व्याख्या
आज के संदर्भ में महत्व
वर्तमान समय में, जब समाज में धार्मिक पहचान से जुड़े विवाद और बहस बढ़ रही हैं, धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक सिद्धांत सामाजिक सौहार्द बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सिद्धांत विविधता में एकता के भारतीय विचार को मजबूत करता है।
धार्मिक स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। संविधान द्वारा दिया गया यह अधिकार तभी सार्थक है, जब इसका उपयोग सहिष्णुता, सम्मान और सामाजिक संतुलन के साथ किया जाए।
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