January 2, 2026
नई दिल्ली: Constitution of India केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की आधारशिला है। यह संविधान देश के शासन की दिशा तय करता है और नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों तथा राज्य की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।
26 जनवरी 1950 को लागू हुआ भारतीय संविधान स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। समय के साथ इसमें संशोधन हुए हैं, लेकिन इसकी मूल भावना और लोकतांत्रिक आत्मा आज भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है।
प्रस्तावना: संविधान की आत्मा
संविधान की प्रस्तावना भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। यह नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देती है, जो भारतीय लोकतंत्र के मूल स्तंभ हैं।
मौलिक अधिकार और कर्तव्य
संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार और संवैधानिक उपचार का अधिकार शामिल है। इन अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्य भी तय किए गए हैं, ताकि अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बना रहे।
संघीय व्यवस्था और शासन प्रणाली
भारतीय संविधान संघीय ढांचे पर आधारित है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है। संसदीय शासन प्रणाली के तहत प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख होते हैं, जबकि राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख की भूमिका निभाते हैं।
- केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन
- स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था
- लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती
संविधान का वर्तमान महत्व
आज के समय में संविधान लोकतंत्र की रक्षा, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और शासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे मजबूत माध्यम बना हुआ है। संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान ही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
Constitution of India समय के साथ बदलती परिस्थितियों में भी लोकतांत्रिक स्थिरता बनाए रखने में सफल रहा है। अधिकारों, कर्तव्यों और संस्थागत संतुलन का यह ढांचा भारत को एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र बनाता है।

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