January 2, 2026
संविधान की मूल भावना का अर्थ वह आत्मिक विचार और उद्देश्य है, जिन पर हमारे देश की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी है। भारत के संदर्भ में यह भावना हमें Preamble (प्रस्तावना) से सबसे स्पष्ट रूप से समझ में आती है। यह केवल एक कानूनी किताब नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के अधिकारों का सुरक्षा कवच है।
संविधान की मूल भावना के 6 प्रमुख स्तंभ
भारत के संविधान को समझने के लिए इसके इन छह बुनियादी सिद्धांतों को समझना आवश्यक है:
इसका अर्थ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय से है। हर नागरिक को समान अवसर मिले और समाज से शोषण, भेदभाव व अन्याय का पूरी तरह अंत हो।
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता। यह हर व्यक्ति को अपनी सोच के अनुसार जीवन जीने की आज़ादी देती है।
कानून के सामने सभी नागरिक समान हैं। जाति, धर्म, लिंग या भाषा के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव वर्जित है।
सभी नागरिकों में भाईचारे की भावना विकसित करना ताकि राष्ट्रीय एकता और अखंडता मज़बूत हो सके और व्यक्ति की गरिमा का सम्मान हो।
भारत में सत्ता का अंतिम स्रोत 'जनता' है। यहाँ चुनी हुई सरकार, जवाबदेही और कानून का शासन ही सर्वोपरि है।
राज्य का अपना कोई राजकीय धर्म नहीं है। यहाँ सभी धर्मों को समान सम्मान और अपनी मान्यताओं को मानने की पूर्ण स्वतंत्रता है।
“संविधान की मूल भावना एक ऐसा भारत बनाना है जहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र, समान, सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी सके।”
संविधान की ये विशेषताएँ केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये सुनिश्चित करती हैं कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र बना रहे। जब भी शासन या कानून की व्याख्या में कोई दुविधा होती है, तो न्यायपालिका इन्ही 'मूल भावनाओं' का सहारा लेकर सही दिशा तय करती है।
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