January 4, 2026
लोकसभा स्पीकर (Lok Sabha Speaker) भारतीय संसद के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों में से एक हैं। स्पीकर की नियुक्ति प्रक्रिया संविधान और संसदीय परंपराओं पर आधारित होती है, जिसका उद्देश्य सदन की कार्यवाही को निष्पक्ष और सुचारु रूप से संचालित करना है।
लोकसभा स्पीकर की नियुक्ति कैसे होती है?
लोकसभा के आम चुनाव के बाद जब नई लोकसभा का गठन होता है, तो सदन की पहली बैठकों में लोकसभा स्पीकर का चुनाव किया जाता है। स्पीकर का चयन लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों में से ही होता है।
आमतौर पर सत्तारूढ़ दल या गठबंधन स्पीकर पद के लिए एक उम्मीदवार का प्रस्ताव करता है। इस प्रस्ताव का समर्थन अन्य सांसदों द्वारा किया जाता है। यदि केवल एक उम्मीदवार होता है, तो उसे सर्वसम्मति से स्पीकर घोषित कर दिया जाता है।
मतदान की स्थिति में प्रक्रिया
यदि स्पीकर पद के लिए एक से अधिक उम्मीदवार होते हैं, तो लोकसभा में मतदान कराया जाता है। जिस उम्मीदवार को साधारण बहुमत (50 प्रतिशत से अधिक मत) प्राप्त होते हैं, वह लोकसभा स्पीकर निर्वाचित होता है।
प्रो-टेम स्पीकर की भूमिका
नई लोकसभा के गठन के समय जब तक स्थायी स्पीकर का चयन नहीं हो जाता, तब तक प्रो-टेम स्पीकर सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं। प्रो-टेम स्पीकर की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो नए सांसदों को शपथ दिलाने और स्पीकर के चुनाव की प्रक्रिया संचालित करते हैं।
कार्यकाल और पद की सुरक्षा
लोकसभा स्पीकर का कार्यकाल पूरी लोकसभा के कार्यकाल या उनके इस्तीफे तक रहता है। स्पीकर को पद से हटाने के लिए लोकसभा में विशेष प्रस्ताव लाया जाता है, जिसे बहुमत से पारित करना आवश्यक होता है।
निष्कर्ष
लोकसभा स्पीकर की नियुक्ति प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र में निष्पक्षता और संतुलन को सुनिश्चित करती है। स्पीकर से अपेक्षा की जाती है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सदन की गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करें।
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