January 3, 2026
कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर में गंगा नदी के किनारे एक दुर्लभ प्रजाति की गंगा डॉल्फिन मृत अवस्था में मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। स्थानीय प्रशासन और वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर डॉल्फिन के शव को कब्जे में लिया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
अधिकारियों के अनुसार, डॉल्फिन की लंबाई लगभग 10 फीट और वजन करीब 350 किलो आंका गया है। प्रारंभिक जांच में शव कुछ दिन पुराना प्रतीत हो रहा है, हालांकि मौत के सही कारणों की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी।
घटना कैसे सामने आई
यह मामला जाजमऊ थाना क्षेत्र का है, जहां नदी में काम कर रहे स्थानीय नाविकों ने गंगा में एक बड़ा शव तैरता हुआ देखा। करीब जाकर देखने पर यह एक डॉल्फिन निकली, जिसकी सूचना तुरंत पुलिस और वन विभाग को दी गई। इसके बाद अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर आगे की कार्रवाई शुरू की।
Pollution और Industry पर सवाल
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जाजमऊ क्षेत्र में मौजूद टेनरी उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक युक्त पानी सीधे गंगा में छोड़ा जाता है, जिससे नदी का जल गंभीर रूप से प्रदूषित हो रहा है। क्रोमियम जैसे खतरनाक केमिकल्स जलीय जीवों के लिए घातक साबित हो सकते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, डॉल्फिन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से इन विषैले तत्वों को ग्रहण करती हैं, जो लंबे समय में उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए घातक बन जाते हैं।
गंगा डॉल्फिन का महत्व
गंगा डॉल्फिन को नदी की स्वच्छता का प्राकृतिक संकेतक माना जाता है। इसे 1972 के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजाति का दर्जा प्राप्त है। इनकी मौजूदगी ‘नमामि गंगे’ जैसे सरकारी अभियानों की सफलता को दर्शाती है।
हालिया सर्वे आंकड़ों के अनुसार, गंगा नदी में डॉल्फिन की कुल संख्या हजारों में दर्ज की गई है, लेकिन कानपुर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में इनकी संख्या लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।
आगे की कार्रवाई
वन विभाग ने मामले की विस्तृत जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि डॉल्फिन की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई या प्रदूषण इसका मुख्य कारण रहा। इस घटना ने एक बार फिर गंगा की सफाई और औद्योगिक निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
कानपुर में गंगा डॉल्फिन की मौत केवल एक वन्यजीव घटना नहीं, बल्कि नदी प्रदूषण और औद्योगिक नियंत्रण की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। यदि ऐसे मामलों पर सख़्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह दुर्लभ प्रजाति भविष्य में गंभीर संकट का सामना कर सकती है।
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