January 2, 2026
नई दिल्ली: किसी भी समाज की मजबूती उसके कानूनों या संस्थाओं से नहीं, बल्कि लोगों की सहभागिता और जिम्मेदारी की संवेदनशीलता से तय होती है। जब नागरिक केवल अधिकारों की बात नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को भी समझते हैं, तभी एक संतुलित और जागरूक समाज का निर्माण होता है।
समाज में सहभागिता का अर्थ केवल मतदान या आंदोलन तक सीमित नहीं है। यह दैनिक जीवन में नियमों का पालन, दूसरों के अधिकारों का सम्मान, सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा और सामाजिक मुद्दों पर सचेत प्रतिक्रिया देने से जुड़ी होती है।
सहभागिता की संवेदनशीलता क्या है?
सहभागिता की संवेदनशीलता का अर्थ है समाज की समस्याओं को केवल बाहरी मुद्दा न मानकर, उन्हें अपनी जिम्मेदारी समझना। जब लोग गरीबी, असमानता, पर्यावरण या भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर संवेदनशील होते हैं, तो वे समाधान की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं।
जिम्मेदारी और नागरिक चेतना
जिम्मेदारी की संवेदनशीलता नागरिक चेतना का आधार होती है। यह भावना विकसित करती है कि व्यवस्था केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझी जिम्मेदारी है। स्वच्छता, अनुशासन, कानून का सम्मान और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना इसी चेतना का हिस्सा हैं।
- सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा
- कानून और नियमों का पालन
- सामाजिक सौहार्द और सहिष्णुता
- पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी
लोकतंत्र और सामाजिक सहभागिता
लोकतंत्र में सक्रिय और संवेदनशील नागरिक सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। जब लोग नीतियों पर सवाल करते हैं, रचनात्मक सुझाव देते हैं और संवाद में भाग लेते हैं, तो शासन अधिक जवाबदेह बनता है। निष्क्रिय समाज में लोकतंत्र केवल औपचारिक रह जाता है।
निष्कर्ष
समाज में लोगों की सहभागिता और उनकी जिम्मेदारी की संवेदनशीलता केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता की आवश्यकता है। एक जागरूक, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक समाज ही लोकतंत्र को मजबूत, न्यायपूर्ण और भविष्य के लिए सुरक्षित बना सकता है।
सहभागिता और जिम्मेदारी किसी भी समाज के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का पैमाना होती हैं। जब नागरिक केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बनते हैं, तभी समाज में सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन संभव होता है।
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